शुक्र ग्रह का प्रभाव, दोष और उपाय | Shukra Graha in Astrology
शुक्र ग्रह को सौंदर्य, प्रेम, विवाह, ऐश्वर्य, कला, विलास और भोग
📌 शुभ प्रभाव:
- विवाह और प्रेम जीवन में संतुलन
- कला और संगीत में रुचि
- सौंदर्य और शारीरिक आकर्षण
- भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति
- विलासितापूर्ण जीवनशैली
⚠️ अशुभ प्रभाव (शुक्र दोष):
- विवाह में समस्याएं या विलंब
- कला या रचनात्मकता में बाधा
- भोग-विलास में अति
- तनावपूर्ण प्रेम जीवन
- किडनी या प्रजनन संबंधी रोग
🛡️ शुक्र दोष से बचाव के उपाय:
- शुक्रवार को सफेद वस्त्र पहनें
- चांदी, सफेद मिष्ठान्न और चावल का दान करें
- गाय को चारा खिलाएं
- “ॐ शुं शुक्राय नमः” मंत्र का 108 बार जप करें
📜 शुक्र ग्रह का लघु स्तोत्र (Shukra Graha Stotra – Short Version):
हिमकुंदमृताब्धिसंभावं दैत्यानां परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥
📜 शुक्र ग्रह का विस्तृत स्तोत्र (Shukra Graha Stotra – Long Version):
शुक्रो दैत्यगुरुः श्रीमान् तेजस्वी लोकपूजितः। सौम्यः कलासंपूर्णश्च रतिक्रीड़ापरायणः॥ सर्वसौंदर्यदातारं, विवाहार्थसिद्धिप्रदं। दु:स्वप्ननाशनं देवं, शुक्रदेवं नमाम्यहम्॥ कामरूपधारी देवा, भक्तवत्सल भक्तिप्रियः। दिव्यसंगीतप्रियं च, कलानिपुणमुत्तमम्॥ प्रेमसौंदर्यसंपन्नं, सुखसंपत्तिवर्धनम्। विलासप्रियं दयालुं च, शुक्रं वंदे पुनः पुनः॥ श्वेताम्बरधरं देवं, रत्नसिंहासनस्थितम्। श्वेतपुष्पप्रियो नित्यं, श्वेतगंधसमन्वितम्॥ मृदु भाषी दयासिन्धु, शुद्धचित्तसुखप्रदः। स्निग्धदृष्टिः सुहृद्बंधुः, सौम्यवाक्यप्रदायकः॥ शुक्र ग्रह नमस्तुभ्यं, करुणासागर प्रभो। विनाशय मम दोषान्, दारिद्र्यं च दुरात्मनम्॥ विवाह बाधा नाशाय, स्त्रीसुख वृद्धि हेतुने। धनधान्य प्रदातारं, नमामि त्वां गुरुं शुभम्॥ त्वया प्रसादे संसारे, सौंदर्यं सुखमेव च। भवेत् संपत्तिरत्नानि, यशो वैराग्यमेव च॥ स्तोत्रं यः श्रद्धया नित्यं, शुक्रे संप्रणम्य च। पठति भक्तिसंयुक्तः, तस्य कष्टं विनश्यति॥ ॥ इति श्री शुक्र ग्रह स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥📜 शुक्र ग्रह का विस्तृत स्तोत्र (Shukra Graha Stotra – Long Version):
श्री शुक्र स्तोत्रम् (स्कन्द पुराण से)
नमस्ते भार्गवश्रेष्ठ देवदानवपूजित।
वृष्टिरोधप्रकर्त्रे च वृष्टिकर्त्रे नमो नमः॥
देवयानीपितस्तुभ्यं वेदवेदाङ्गपारगः।
परेण तपसा शुद्धः शंकरो लोकशंकरः॥
प्राप्तो विद्यां जीवनाख्यां तस्मै शुक्रात्मने नमः।
नमस्तस्मै भगवते भृगुपुत्राय वेधसे॥
तारामण्डलमध्यस्थ स्वभासा भासिताम्बरः।
यस्योदये जगत्सर्वं मंगलार्हं भवेदिह॥
अस्तं याते ह्यरिष्टं स्यात्तस्मै मंगलरूपिणे।
त्रिपुरावासिनो दैत्यान् शिवबाणप्रपीडितान्॥
विद्यया जीवयच्छुक्रो नमस्ते भृगुनन्दन।
ययातिगुरवे तुभ्यं नमस्ते कविनन्दन॥
बलिराज्यप्रदो जीवस्तस्मै जीवात्मने नमः।
भार्गवाय नमस्तुभ्यं पूर्वं गीर्वाणवन्दितम्॥
जीवपुत्राय यो विद्यां प्रादात्तस्मै नमोनमः।
नमः शुक्राय काव्याय भृगुपुत्राय धीमहि॥
नमः कारणरूपाय नमस्ते कारणात्मने।
स्तवराजमिदं पुण्यं भार्गवस्य महात्मनः॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि लभते वाञ्छितं फलम्।
पुत्रकामो लभेत्पुत्रान् श्रीकामो लभते श्रियम्॥
राज्यकामो लभेद्राज्यं स्त्रीकामः स्त्रियमुत्तमाम्।
भृगुवारे प्रयत्नेन पठितव्यं सुसंहितैः॥
अन्यवारे तु होरायां पूजयेद्भृगुनन्दनम्।
रोगार्तो मुच्यते रोगात् भयार्तो मुच्यते भयात्॥
यद्यत्प्रार्थयते वस्तु तत्तत्प्राप्नोति सर्वदा।
प्रातः काले प्रकर्तव्या भृगुपूजा प्रयत्नतः॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नुयाच्छिवसन्निधिम्॥
॥ इति श्री स्कन्दपुराणे शुक्रस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
ଶ୍ରୀ ଶୁକ୍ର ଷ୍ଟୋତ୍ରମ୍ (ସ୍କନ୍ଦ ପୁରାଣ ଅନୁସାରେ - ଓଡ଼ିଆ ଅନୁବାଦ)
ନମସ୍ତେ ଭାର୍ଗବଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦେବଦାନବପୂଜିତ ।
ବୃଷ୍ଟିରୋଧପ୍ରକର୍ତ୍ତ୍ରେ ଚ ବୃଷ୍ଟିକର୍ତ୍ରେ ନମୋ ନମଃ॥
ଦେବୟାନୀପିତାସ୍ତୁଭ୍ୟଂ ୱେଦୱେଦାଙ୍ଗପାରଗଃ।
ପରେଣ ତପସା ଶୁଦ୍ଧଃ ଶଂକରୋ ଲୋକଶଂକରଃ॥
ପ୍ରାପ୍ତୋ ୱିଦ୍ୟାଂ ଜୀବନାଖ୍ୟାଂ ତସ୍ମୈ ଶୁକ୍ରାତ୍ମନେ ନମଃ।
ନମସ୍ତସ୍ମୈ ଭଗବତେ ଭୃଗୁପୁତ୍ରାୟ ୱେଧସେ॥
ତାରାମଣ୍ଡଳମଧ୍ୟସ୍ଥ ସ୍ୱଭାସା ଭାସିତାମ୍ବରଃ।
ୟସ୍ୟୋଦୟେ ଜଗତ୍ସର୍ଵଂ ମଙ୍ଗଳାର୍ହଂ ଭବେଦିହ॥
ଅସ୍ତଂ ଯାତେ ହ୍ୟରିଷ୍ଟଂ ସ୍ୟାତ୍ତସ୍ମୈ ମଙ୍ଗଳରୂପିଣେ।
ତ୍ରିପୁରାବାସିନୋ ଦୈତ୍ୟାନ୍ ଶିବବାଣପ୍ରପୀଡିତାନ୍॥
ଵିଦ୍ୟୟା ଜୀବୟଚ୍ଛୁକ୍ରୋ ନମସ୍ତେ ଭୃଗୁନନ୍ଦନ।
ଯୟାତିଗୁରବେ ତୁଭ୍ୟଂ ନମସ୍ତେ କବିନନ୍ଦନ॥
ବଲିରାଜ୍ୟପ୍ରଦୋ ଜୀବସ୍ତସ୍ମୈ ଜୀବାତ୍ମନେ ନମଃ।
ଭାର୍ଗବାୟ ନମସ୍ତୁଭ୍ୟଂ ପୂର୍ୱଂ ଗୀର୍ୱାଣବନ୍ଦିତମ୍॥
ଜୀବପୁତ୍ରାୟ ୟୋ ଵିଦ୍ୟାଂ ପ୍ରାଦାତ୍ତସ୍ମୈ ନମୋନମଃ।
ନମଃ ଶୁକ୍ରାୟ କାବ୍ୟାୟ ଭୃଗୁପୁତ୍ରାୟ ଧୀମହି॥
ନମଃ କାରଣରୂପାୟ ନମସ୍ତେ କାରଣାତ୍ମନେ।
ଷ୍ଟବରାଜମିଦଂ ପୁଣ୍ୟଂ ଭାର୍ଗବସ୍ୟ ମହାତ୍ମନଃ॥
ୟଃ ପଠେଚ୍ଛୃଣୁୟାଦ୍ୱାପି ଲଭତେ ଵାଞ୍ଛିତଂ ଫଳମ୍।
ପୁତ୍ରକାମୋ ଲଭେତ୍ପୁତ୍ରାନ୍ ଶ୍ରୀକାମୋ ଲଭତେ ଶ୍ରିୟମ୍॥
ରାଜ୍ୟକାମୋ ଲଭେଦ୍ରାଜ୍ୟଂ ସ୍ତ୍ରୀକାମଃ ସ୍ତ୍ରୀୟମୁତ୍ତମାମ୍।
ଭୃଗୁବାରେ ପ୍ରୟତ୍ନେନ ପଠିତବ୍ୟଂ ସମାହିତୈଃ॥
ଅନ୍ୟବାରେ ତୁ ହୋରାୟାଂ ପୂଜୟେଦ୍ଭୃଗୁନନ୍ଦନମ୍।
ରୋଗାର୍ତ୍ତୋ ମୁଚ୍ୟତେ ରୋଗାତ୍ ଭୟାର୍ତ୍ତୋ ମୁଚ୍ୟତେ ଭୟାତ୍॥
ୟଦ୍ୟତ୍ପ୍ରାର୍ଥୟତେ ଵସ୍ତୁ ତତ୍ତତ୍ପ୍ରାପ୍ନୋତି ସର୍ଵଦା।
ପ୍ରାତଃ କାଳେ ପ୍ରକର୍ତ୍ତବ୍ୟା ଭୃଗୁପୂଜା ପ୍ରୟତ୍ନତଃ॥
ସର୍ଵପାପଵିନିର୍ମୁକ୍ତଃ ପ୍ରାପ୍ନୁୟାଛ୍ଛିଵସନ୍ନିଧିଃ॥
॥ ଇତି ଶ୍ରୀ ସ୍କନ୍ଦପୁରାଣେ ଶୁକ୍ରଷ୍ଟୋତ୍ରଂ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣମ୍ ॥
अपनाने से प्रेम, वैवाहिक सुख और सौंदर्य में वृद्धि होती है।
