ଓଁ ଶ୍ରୀ ଗୁରୁଭ୍ୟୋ ନମଃ ହରିଃ ଓଁ
ଶ୍ରୀ ସୁକ୍ତ
ଓଁ ହିରଣ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣାମିତ୍ୟାଦି ପଞ୍ଚଦଶର୍ଚସ୍ୟ ଶ୍ରୀ ସୁକ୍ତସ୍ୟ ,
ଆନନ୍ଦ କର୍ଦମ ଚି଼କ୍ମିତେନ୍ଦିରା ସୁତାଋଷୟଃ ,
ଆଦ୍ୟାସ୍ତିସ୍ରୋଽନୁଷ୍ଟାଭଃ,
ଚତୁର୍ଥୀ ଵୃହତୀ ପ୍ରସ୍ତାର ପଂକ୍ତିଃ ପଞ୍ଚମୀ ଷଷ୍ଠୌ ତ୍ରିଷ୍ଟୁଭୌ ସପ୍ତମ୍ୟା ଦ୍ୟାଶ୍ଚତୁର୍ଦଶ୍ୟନ୍ତା ଅଷ୍ଟାବନୁଷ୍ଟୂଭଃ ଅନ୍ତ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତାର ପଂକ୍ତିଶ୍ଛନ୍ଦାସି,
ଅପରାଜିତା ମହାଲକ୍ଷ୍ମୀ ର୍ଦେବତା ହିରଣ୍ୟାବର୍ଣା ଇତି ବିଜଂ ତାଂ ମ ଆଵାହ ଇତି ସକ୍ତିଃ, କୀର୍ତ୍ତିମୃଦ୍ଧିଂ ଦଦାତୁ ମ ଇତି କିଳକଂ ମମାଚିରେଣ ଶ୍ରୀୟାଃ ସୁପ୍ରୀତୟେ ପଠନେ ବିନିଯୋଗଃ |
ଧ୍ୟାନମ୍
ଯା ସା ପଦ୍ମାସନାସ୍ଥା ବିପୁଳ କଟିତଟି ପଦ୍ମପତ୍ରାୟ ତାକ୍ଷୀ
ଗମ୍ଭିରାବର୍ତ୍ତ ନାଭିସ୍ତନଭର ନମିତା ଶୁଭ୍ର ବସ୍ତ୍ରୋତ୍ତରିୟା
ଲକ୍ଷ୍ମୀର୍ଦିଵ୍ୟୈ ଗଜେନ୍ଦ୍ରୈ ର୍ମଣିଗଣ ଖଚିତୈଃ ସ୍ନାପିତାଂ ହେମକୁମ୍ଭୈ
ର୍ନିତ୍ୟ ସା ପଦ୍ମହସ୍ତା ବସତୁ ମମଗୃହେ ସର୍ବମାଙ୍ଗଲ୍ୟ ଯୁକ୍ତା |
ଓଂ ହିରଣ୍ୟଵର୍ଣାଂ ହରିଣୀଂ ସୁଵର୍ଣରଜତସ୍ରଜାମ୍ |
ଚନ୍ଦ୍ରାଂ ହିରଣ୍ମୟୀଂ ଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ଜାତଵେଦୋ ମ ଆଵହ || ୧ ||
ତାଂ ମ ଆଵହ ଜାତଵେଦୋ ଲକ୍ଷ୍ମୀମନପଗାମିନୀମ୍ |
ୟସ୍ୟାଂ ହିରଣ୍ୟଂ ଵିନ୍ଦେୟଂ ଗାମଶ୍ଵଂ ପୁରୁଷାନହମ୍ || ୨ ||
ଅଶ୍ଵପୂର୍ଵାଂ ରଥମଧ୍ୟାଂ ହସ୍ତିନାଦ ପ୍ରମୋଦିନୀମ୍ |
ଶ୍ରିୟଂ ଦେଵୀ ମୁପହ୍ଵୟେ ଶ୍ରୀର୍ମା" ଦେଵୀ ଜୁଷତାମ୍ || ୩ ||
କାଂ ସୋସ୍ମିତାଂ ହିରଣ୍ୟପ୍ରାକାରାମାର୍ଦ୍ରାଂ ଜ୍ଵଲନ୍ତୀଂ ତୃପ୍ତାଂ ତର୍ପୟନ୍ତୀମ୍ |
ପଦ୍ମେ ସ୍ଥିତାଂ ପଦ୍ମଵର୍ଣାଂ ତାମିହୋପହ୍ଵୟେ ଶ୍ରିୟମ୍ || ୪ ||
ଚନ୍ଦ୍ରାଂ ପ୍ରଭାସାଂ ୟଶସା ଜ୍ଵଲନ୍ତୀଂ ଶ୍ରିୟଂ ଲୋକେ ଦେଵ ଜୁଷ୍ଟା ମୁଦାରାମ୍ |
ତାଂ ପଦ୍ମିନୀମୀଂ ଶରଣମହଂ ପ୍ରପଦ୍ୟେଽଲକ୍ଷ୍ମୀର୍ମେ ନଶ୍ୟତାଂ ତ୍ଵାଂ ଵୃଣେ || ୫ ||
ଆଦିତ୍ୟଵ ବର୍ଣ୍ଣୋ ତପସୋଽଧିଜାତୋ ଵନସ୍ପତିସ୍ତଵ ଵୃକ୍ଷୋଽଥବିଲ୍ଵଃ |
ତସ୍ୟ ଫଲା"ନି ତପସାନୁଦନ୍ତୁ ମାୟାନ୍ତରାୟାଶ୍ଚ ବାହ୍ୟା ଅଲକ୍ଷ୍ମୀଃ || ୬ ||
ଉପୈତୁ ମାଂ ଦେଵସଖଃ କୀର୍ତିଶ୍ଚ ମଣିନା ସହ |
ପ୍ରାଦୁର୍ଭୂତୋସୁରଽସ୍ମି ରାଷ୍ଟ୍ରେଽସ୍ମିନ୍ କୀର୍ତିମୃଦ୍ଧିଂ ଦଦାତୁ ମେ || ୭ ||
କ୍ଷୁତ୍ପିପାସାମଲାଂ ଜ୍ୟେଷ୍ଠାମଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ନାଶୟାମ୍ୟହମ୍ |
ଅଭୂତିମସମୃଦ୍ଧିଂ ଚ ସର୍ଵାଂ ନିର୍ଣ୍ଣୁଦ ମେ ଗୃହାତ୍ || ୮ ||
ଗନ୍ଧଦ୍ଵାରାଂ ଦୁରାଧର୍ଷାଂ ନିତ୍ୟପୁଷ୍ପାଂ କରୀଷିଣୀମ୍ |
ଈଶ୍ଵରୀଂ ସର୍ଵଭୂତାନାଂ ତାମିହୋପ ହ୍ଵୟେ ଶ୍ରିୟମ୍ || ୯ ||
ମନସଃ କାମମାକୂତିଂ ଵାଚଃ ସତ୍ୟମଶୀମହି |
ପଶୂନାଂ ରୂପମନ୍ନସ୍ୟ ମୟି ଶ୍ରୀଃ ଶ୍ରୟତାଂ ୟଶଃ || ୧୦ ||
କର୍ଦମେନ ପ୍ରଜାଭୂତା ମୟି ସଂଭଵ କର୍ଦମ |
ଶ୍ରିୟଂ ଵାସୟ ମେ କୁଲେ ମାତରଂ ପଦ୍ମମାଲିନୀମ୍ || ୧୧ ||
ଆପଃ ସୃଜଂତୁ ସ୍ନିଗ୍ଧାନି ଚିକ୍ଲୀତ ଵସ ମେ ଗୃହେ |
ନି ଚ ଦେଵୀଂ ମାତରଂ ଶ୍ରିୟଂ ଵାସୟ ମେ କୁଲେ || ୧୨ ||
ଆର୍ଦ୍ରାଂ ପୁଷ୍କରିଣୀଂ ପୁଷ୍ଟିଂ ପିଂଗଲାଂ ପଦ୍ମମାଲିନୀମ୍ |
ଚନ୍ଦ୍ରାଂ ହିରଣ୍ମୟୀଂ ଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ଜାତଵେଦୋ ମ ଆଵହ || ୧୩ ||
ଆର୍ଦ୍ରାଂ ୟଃ କରିଣୀଂ ୟଷ୍ଟିଂ ସୁଵର୍ଣାଂ ହେମମାଲିନୀମ୍ |
ସୂର୍ୟାଂ ହିରଣ୍ମୟୀଂ ଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ଜାତଵେଦୋ ମ ଆଵହ || ୧୪ ||
ତାଂମ ଆଵହ ଜାତଵେଦୋ ଲକ୍ଷ୍ମୀମନପଗାମିନୀମ୍ |
ୟସ୍ୟାଂ ହିରଣ୍ୟଂ ପ୍ରଭୂତଂ ଗାଵୋ ଦାସ୍ୟୋଽଶ୍ଵାନ, ଵିଂଦେୟଂ ପୁରୁଷାନହମ୍ || ୧୫ ||
ଫଲଶ୍ରୁତିଃ
ୟଃ ଶୁଚିଃ ପ୍ରୟତୋ ଭୂତ୍ଵା ଜୁହୁୟାଦାଜ୍ୟ ମନ୍ଵହମ୍ |
ସୁକ୍ତଂ ପଞ୍ଚଦଶର୍ଚ୍ଚ ଚ ଶ୍ରୀକାମଃ ସତତଂ ଜପେତ୍ || ୧ ||
ପଦ୍ମାନନେ ପଦ୍ମ ଊରୂ ପଦ୍ମାକ୍ଷୀ ପଦ୍ମସଂଭଵେ |
ତନ୍ମୋ ଭଜସି ପଦ୍ମାକ୍ଷି ଯେନ ସୌଖ୍ୟଂ ଲଭା ମ୍ୟହମ୍ || ୨ ||
ଅଶ୍ଵଦାୟୀ ଗୋଦାୟୀ ଧନଦାୟୀ ମହାଧନେ |
ଧନଂ ମେ ଜୁଷତାଂ ଦେଵି ସର୍ଵକାମାଶ୍ଚ ଦେହି ମେ || ୩ ||
ପଦ୍ମାନନେ ପଦ୍ମବିପଦ୍ମ ପତ୍ରେ ପଦ୍ମପ୍ରିୟେ ପଦ୍ମଦଲାୟତାକ୍ଷୀ |
ବିଶ୍ୱ ପ୍ରିୟେ ବିଷ୍ଣୁ ମନୋଽନୁକୂଳେ ତ୍ୱତପାଦପଦ୍ମଂ ମୟୀ ସଂ ନି ଧାତସ୍ଵ | || ୪ ||
ପୁତ୍ର ପୌତ୍ର ଧନଂ ଧାନ୍ୟଂ ହସ୍ତ୍ୟଶ୍ଵାଶ୍ଵତରୀ ରଥମ୍ |
ପ୍ରଜାନାଂ ଭଵସି ମାତା ଆୟୁଷ୍ମନ୍ତଂ କରୋତୁ ମେ || ୫ ||
ଧନମଗ୍ନିର୍ଧନଂ ଵାୟୁର୍ଧନଂ ସୂର୍ୟୋ ଧନଂ ଵସୁଃ |
ଧନମିଂଦ୍ରୋ ବୃହସ୍ପତିର୍ଵରୁଣୋ ଧନମଶ୍ଵିନା || ୬ ||
ଵୈନତେୟ ସୋମଂ ପିବ ସୋମଂ ପିବତୁ ଵୃତ୍ରହା |
ସୋମଂ ଧନସ୍ୟ ସୋମିନୋ ମହ୍ୟଂ ଦଦାତୁ ସୋମିନଃ || ୭ ||
ନ କ୍ରୋଧୋ ନ ଚ ମାତ୍ସର୍ୟଂ ନ ଲୋଭୋ ନାଶୁଭା ମତିଃ |
ଭଵନ୍ତି କୃତପୁଣ୍ୟାନାଂ ଭକ୍ତା ଶ୍ରୀସୂକ୍ତଂ ଜାପୀନାମ || ୮ ||
ଋଣ ରୋଗାଦି ଦାରିଦ୍ର୍ୟ ପାପକ୍ଷୁଦପମୃତ୍ୟଵଃ |
ଭୟ ଶୋକମନସ୍ତାପା ନଶ୍ୟଂତୁ ମମ ସର୍ଵଦା || ୧୯ ||
ଶ୍ରୀର୍ଵର୍ଚସ୍ଵମାୟୁଷ୍ୟମାରୋଗ୍ୟମାଵିଧାଚ୍ଛୋଭମାନଂ ମହୀୟତେ" |
ଧନଂ ଧାନ୍ୟଂ ପଶୁଂ ବହୁପୁତ୍ରଲାଭଂ ଶତସଂଵଥ୍ସରଂ ଦୀର୍ଘମାୟୁଃ || ୧୮ ||
ଵର୍ଷଂତୁ ତେ ଵିଭାଵରିଦିଵୋ ଅଭ୍ରସ୍ୟ ଵିଦ୍ୟୁତଃ |
ରୋହଂତୁ ସର୍ଵବୀଜାନ୍ୟଵ ବ୍ରହ୍ମଦ୍ଵିଷୋ" ଜହି || ୯ ||
ଵିଷ୍ଣୁପତ୍ନୀଂ କ୍ଷମାଂ ଦେଵୀଂ ମାଧଵୀଂ ମାଧଵପ୍ରିୟାମ୍ |
ଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ପ୍ରିୟସଖୀଂ ଭୂମିଂ ନମାମ୍ୟଚ୍ୟୁତଵଲ୍ଲଭାମ୍ || ୧୬ ||
ମହାଲକ୍ଷ୍ମୈ ଚ ଵିଦ୍ମହେ ଵିଷ୍ଣୁପତ୍ନ୍ୟୈ ଚ ଧୀମହି |
ତନ୍ନୋ ଲକ୍ଷ୍ମୀଃ ପ୍ରଚୋଦୟାତ୍ || ୧୭ ||
॥ श्री सूक्त ॥
|| ଶ୍ରୀ ସୂକ୍ତମ ||
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥1॥
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥2॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥3॥
ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥4॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥5॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥6॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥7॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥8॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥9॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥10॥
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥11॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥12॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥13॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥14॥
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥15॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥16॥
पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सं नि धत्स्व ॥17॥
पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षि पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥18॥
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥19॥
पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥20॥
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना ॥21॥
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥22॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्त्या श्रीसूक्तजापिनाम् ॥23॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्र सीद मह्यम् ॥24॥
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
लक्ष्मीं प्रियसखीं भूमिं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥25॥
महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥26॥
आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।
ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः ॥27॥
ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥28॥
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥29॥
1- अर्थ – हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! सुवर्ण के रंग वाली, सोने और चाँदी के हार पहनने वाली, चन्द्रमा के समान प्रसन्नकांति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिये आवाहन करो।
2- अर्थ – अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवी को, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं सोना, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि को प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो।
3- अर्थ – जिन देवी के आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं तथा जो हस्तिनाद को सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवी का मैं आवाहन करता हूँ; लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों।कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां
4- अर्थ – जो साक्षात ब्रह्मरूपा, मंद-मंद मुसकराने वाली, सोने के आवरण से आवृत, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, अपने भक्तों पर अनुग्रह करनेवाली, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
5- अर्थ – मैं चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों के द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता लक्ष्मीदेवी की शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ।
6- अर्थ – हे सूर्य के समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल हमारे बाहरी और भीतरी दारिद्र्य को दूर करें।
7- अर्थ – देवि ! देवसखा कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों अर्थात मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।
8- अर्थ – लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन और क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि ! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्र्य और अमंगल को दूर करो।
9 - अर्थ – जो दुराधर्षा और नित्यपुष्टा हैं तथा गोबर से ( पशुओं से ) युक्त गन्धगुणवती हैं। पृथ्वी ही जिनका स्वरुप है, सब भूतों की स्वामिनी उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ अपने घर में आवाहन करता हूँ।
10 - अर्थ – मन की कामनाओं और संकल्प की सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हो। गौ आदि पशु एवं विभिन्न प्रकार के अन्न भोग्य पदार्थों के रूप में तथा यश के रूप में श्रीदेवी हमारे यहाँ आगमन करें।
11- अर्थ – लक्ष्मी के पुत्र कर्दम की हम संतान हैं। कर्दम ऋषि ! आप हमारे यहाँ उत्पन्न हों तथा पद्मों की माला धारण करनेवाली माता लक्ष्मीदेवी को हमारे कुल में स्थापित करें।
12 - अर्थ – जल स्निग्ध पदार्थों की सृष्टि करे। लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! आप भी मेरे घर में वास करें और माता लक्ष्मीदेवी का मेरे कुल में निवास करायें।
13 - अर्थ – अग्ने ! आर्द्रस्वभावा, कमलहस्ता, पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मों की माला धारण करनेवाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे यहाँ आवाहन करें।
14- अर्थ – अग्ने ! जो दुष्टों का निग्रह करनेवाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करनेवाली यष्टिरूपा, सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें।
15-अर्थ – अग्ने ! कभी नष्ट न होनेवाली उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें, जिनके आगमन से बहुत-सा धन, गौएँ, दासियाँ, अश्व और पुत्रादि को हम प्राप्त करें।
16-अर्थ – जिसे लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्नि में घी की आहुतियाँ दे तथा इन पंद्रह ऋचाओं वाले श्री सूक्त का निरन्तर पाठ करे।
17 - अर्थ – कमल के समान मुखवाली ! कमलदल पर अपने चरणकमल रखनेवाली ! कमल में प्रीति रखनेवाली ! कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाली ! समग्र संसार के लिये प्रिय ! भगवान विष्णु के मन के अनुकूल आचरण करनेवाली ! आप अपने चरणकमल को मेरे हृदय में स्थापित करें।
18 - अर्थ – कमल के समान मुखमण्डल वाली ! कमल के समान ऊरुप्रदेश वाली ! कमल के समान नेत्रोंवाली ! कमल से आविर्भूत होनेवाली ! पद्माक्षि ! आप उसी प्रकार मेरा पालन करें, जिससे मुझे सुख प्राप्त हो।
19- अर्थ – अश्वदायिनी, गोदायिनी, धनदायिनी, महाधनस्वरूपिणी हे देवि ! मेरे पास सदा धन रहे, आप मुझे सभी अभिलषित वस्तुएँ प्रदान करें।
20- अर्थ – आप प्राणियों की माता हैं। मेरे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, हाथी, घोड़े, खच्चर तथा रथ को दीर्घ आयु से सम्पन्न करें।
21- अर्थ – अग्नि, वायु, सूर्य, वसुगण, इन्द्र, बृहस्पति, वरुण तथा अश्विनी कुमार – ये सब वैभवस्वरुप हैं।
22- अर्थ – हे गरुड ! आप सोमपान करें। वृत्रासुर के विनाशक इन्द्र सोमपान करें। वे गरुड तथा इन्द्र धनवान सोमपान करने की इच्छा वाले के सोम को मुझ सोमपान की अभिलाषा वाले को प्रदान करें।
23- अर्थ – भक्तिपूर्वक श्री सूक्त का जप करनेवाले, पुण्यशाली लोगों को न क्रोध होता है, न ईर्ष्या होती है, न लोभ ग्रसित कर सकता है और न उनकी बुद्धि दूषित ही होती है।
24- अर्थ – कमलवासिनी, हाथ में कमल धारण करनेवाली, अत्यन्त धवल वस्त्र, गन्धानुलेप तथा पुष्पहार से सुशोभित होनेवाली, भगवान विष्णु की प्रिया लावण्यमयी तथा त्रिलोकी को ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली हे भगवति ! मुझपर प्रसन्न होइये।
25- अर्थ – भगवान विष्णु की भार्या, क्षमास्वरूपिणी, माधवी, माधवप्रिया, प्रियसखी, अच्युतवल्लभा, भूदेवी भगवती लक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ।
26- अर्थ – हम विष्णु पत्नी महालक्ष्मी को जानते हैं तथा उनका ध्यान करते हैं। वे लक्ष्मीजी सन्मार्ग पर चलने के लिये हमें प्रेरणा प्रदान करें।
27- अर्थ – पूर्व कल्प में जो आनन्द, कर्दम, श्रीद और चिक्लीत नामक विख्यात चार ऋषि हुए थे। उसी नाम से दूसरे कल्प में भी वे ही सब लक्ष्मी के पुत्र हुए। बाद में उन्हीं पुत्रों से महालक्ष्मी अति प्रकाशमान शरीर वाली हुईं, उन्हीं महालक्ष्मी से देवता भी अनुगृहीत हुए।
28- अर्थ – हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! सुवर्ण के रंग वाली, सोने और चाँदी के हार पहनने वाली, चन्द्रमा के समान प्रसन्नकांति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिये आवाहन करो।
29- अर्थ – भगवती महालक्ष्मी मानव के लिये ओज, आयुष्य, आरोग्य, धन-धान्य, पशु, अनेक पुत्रों की प्राप्ति तथा सौ वर्ष के दीर्घ जीवन का विधान करें और मानव इनसे मण्डित होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करे।
॥ ऋग्वेद वर्णित श्री सूक्त सम्पूर्ण ॥
