ରାବଣକୃତ ଶିବତାଣ୍ଡବ ସ୍ତୋତ୍ର
ଜଟା ଟଵୀ ଗଲଜ୍ଜଲ ପ୍ରଵାହ ପାଵିତସ୍ଥଲେ
ଗଲେଵଲଂବ୍ୟ ଲଂବିତାଂ ଭୁଜଂଗତୁଂଗମାଲିକାମ୍ ।
ଡମଡ୍ଡମ ଡ୍ଡମଡ୍ଡମ ନ୍ନିନାଦ ଵଡ୍ଡମର୍ଵୟଂ
ଚକାର ଚଂଡତାଂଡଵଂ ତନୋତୁ ନଃ ଶିଵଃ ଶିଵମ୍ ॥ 1 ॥
ଜଟାକଟା ହସଂଭ୍ରମ ଭ୍ରମ ନ୍ନିଲିଂପ ନିର୍ଝରୀ-
-ଵିଲୋଲ ଵୀଚିଵଲ୍ଲରୀ ଵିରାଜ ମାନ ମୂର୍ଧନି ।
ଧଗଦ୍ଧଗ ଦ୍ଧଗଜ୍ଜ୍ଵଲ ଲ୍ଲଲାଟ ପଟ୍ଟପାଵକେ
କିଶୋର ଚଂଦ୍ରଶେଖରେ ରତିଃ ପ୍ରତିକ୍ଷଣଂ ମମ ॥ 2 ॥
ଧରାଧରେଂଦ୍ର ନଂଦିନୀ ଵିଲାସ ବଂଧୁବଂଧୁର
ସ୍ଫୁରଦ୍ଦିଗଂତ ସଂତତି ପ୍ରମୋଦ ମାନ ମାନସେ ।
କୃପା କଟାକ୍ଷ ଧୋରଣୀ ନିରୁଦ୍ଧ ଦୁର୍ଧରା ପଦି
କ୍ଵଚିଦ୍ଦିଗଂବରେ ମନୋ ଵିନୋଦ ମେତୁ ଵସ୍ତୁନି ॥ 3 ॥
ଜଟା ଭୁଜଂଗ ପିଂଗଳ ସ୍ଫୁରତ୍ଫଣା ମଣିପ୍ରଭା
କଦଂବ କୁଂକୁମଦ୍ରଵ ପ୍ରଲିପ୍ତଦିଗ୍ଵ ଧୂମୁଖେ ।
ମଦାଂଧସିଂଧୁ ରସ୍ଫୁର ତ୍ତ୍ଵଗୁତ୍ତରୀୟ ମେଦୁରେ
ମନୋ ଵିନୋଦ ମଦ୍ଭୁତଂ ବିଭର୍ତୁ ଭୂତ ଭର୍ତରି ॥ 4 ॥
ସହସ୍ର ଲୋଚନ ପ୍ରଭୃତ୍ୟ ଶେଷଲେଖ ଶେଖର
ପ୍ରସୂନ ଧୂଳି ଧୋରଣୀ ଵିଧୂସରାଂ ଘ୍ରିପୀଠଭୂଃ ।
ଭୁଜଂଗରାଜ ମାଲୟା ନିବଦ୍ଧ ଜାଟଜୂଟକଃ
ଶ୍ରିୟୈ ଚିରାୟ ଜାୟତାଂ ଚକୋର ବଂଧୁଶେଖରଃ ॥ 5 ॥
ଲଲାଟ ଚତ୍ଵରଜ୍ଵଲ ଦ୍ଧନଂଜୟ ସ୍ଫୁଲିଂଗଭା-
-ନିପୀତପଂଚ ସାୟକଂ ନମ ନ୍ନିଲିଂପ ନାୟକମ୍ ।
ସୁଧା ମୟୂଖ ଲେଖୟା ଵିରାଜ ମାନଶେଖରଂ
ମହାକପାଲି ସଂପଦେ ଶିରୋଜଟା ଲମସ୍ତୁ ନଃ ॥ 6 ॥
କରାଲଭାଲ ପଟ୍ଟିକା ଧଗଦ୍ଧଗ ଦ୍ଧଗଜ୍ଜ୍ଵଲ-
ଦ୍ଧନଂଜୟା ଧରୀକୃତ ପ୍ରଚଂଡ ପଂଚସାୟକେ ।
ଧରାଧରେଂଦ୍ର ନଂଦିନୀ କୁଚାଗ୍ରଚିତ୍ର ପତ୍ରକ-
-ପ୍ରକଲ୍ପନୈକ ଶିଲ୍ପିନି ତ୍ରିଲୋଚନେ ରତିର୍ମମ ॥ 7 ॥
ନଵୀନ ମେଘମଂଡଲୀ ନିରୁଦ୍ଧ ଦୁର୍ଧରସ୍ଫୁରତ୍
କୁହୂ ନିଶୀଥିନୀ ତମଃ ପ୍ରବଦ୍ଧ ବଦ୍ଧ କନ୍ଧରଃ ।
ନିଲିମ୍ପ ନିର୍ଝରୀ ଧରସ୍ତନୋତୁ କୃତ୍ତିସିନ୍ଧୁରଃ
କଳା ନିଧାନ ବନ୍ଧୁରଃ ଶ୍ରିୟଂ ଜଗଂଦ୍ଧୁରଂଧରଃ ॥ 8 ॥
ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ ନୀଲ ପଂକଜ ପ୍ରପଂଚ କାଲିମ ପ୍ରଭା-
-ଵିଡଂବି କଣ୍ଠକନ୍ଧ ରାରୁଚି ପ୍ରବଦ୍ଧ କଂଧରମ୍ ।
ସ୍ମରଚ୍ଛିଦଂ ପୁରଚ୍ଛିଦଂ ଭଵଚ୍ଛିଦଂ ମଖଚ୍ଛିଦଂ
ଗଜଚ୍ଛିଦାଂଧକଚ୍ଛିଦଂ ତମଂତକଚ୍ଛିଦଂ ଭଜେ ॥ 9 ॥
ଅଖର୍ଵ ସର୍ଵ ମଂଗଳା କଳା କଦଂବ ମଂଜରୀ
ରସ ପ୍ରଵାହ ମାଧୁରୀ ଵିଜୃଂଭଣା ମଧୁ ଵ୍ରତମ୍ ।
ସ୍ମରାଂତକଂ ପୁରାଂତକଂ ଭଵାଂତକଂ ମଖାଂତକଂ
ଗଜାନ୍ତକାନ୍ଧକାନ୍ତକଂ ତମନ୍ତକାନ୍ତକଂ ଭଜେ ॥ 10 ॥
ଜୟ ତ୍ଵଦଭ୍ରଵିଭ୍ରମ ଭ୍ରମ ଦ୍ଭୁଜଂଗ ମଶ୍ଵସ-
-ଦ୍ଵିନିର୍ଗମତ୍କ୍ରମସ୍ଫୁର ତ୍କରାଲ ଫାଲ ହଵ୍ୟଵାଟ୍ ।
ଧିମିଦ୍ଧିମିଦ୍ଧି ମିଧ୍ଵନ ନ୍ମୃଦଙ୍ଗ ତୁଙ୍ଗମଙ୍ଗଲ
ଧ୍ଵନିକ୍ରମ ପ୍ରଵର୍ତିତଃ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ତାଣ୍ଡଵଃ ଶିଵଃ ॥ 11 ॥
ଦୃଷଦ୍ଵି ଚିତ୍ର ତଲ୍ପୟୋ ର୍ଭୁଜଙ୍ଗ ମୌକ୍ତିକ ମସ୍ର ଜୋ
ର୍ଗରିଷ୍ଠ ରତ୍ନ ଲୋଷ୍ଠୟୋଃ ସୁହୃଦ୍ଵିପକ୍ଷ ପକ୍ଷୟୋଃ ।
ତୃଷ୍ଣାର ଵିନ୍ଦ ଚକ୍ଷୁଷୋଃ ପ୍ରଜାମହୀ ମହେନ୍ଦ୍ରୟୋଃ
ସମଂ ପ୍ରଵର୍ତୟନ୍ମନଃ କଦା ସଦାଶିଵଂ ଭଜେ ॥ 12 ॥
କଦା ନିଲିଂପ ନିର୍ଝରୀ ନିକୁଞ୍ଜକୋଟରେ ଵସନ୍
ଵିମୁକ୍ତ ଦୁର୍ମତିଃ ସଦା ଶିରଃସ୍ଥ ମଞ୍ଜଲିଂ ଵହନ୍ ।
ଵିମୁକ୍ତ ଲୋଲ ଲୋଚନୋ ଲଲାଟ ଭାଲ ଲଗ୍ନକଃ
ଶିଵେତି ମନ୍ତ୍ର ମୁଚ୍ଚରନ୍ ସଦା ସୁଖୀ ଭଵାମ୍ୟହମ୍ ॥ 13 ॥
ନିଲିମ୍ପନାଥନାଗରୀ କଦମ୍ବମୌଳିମଲ୍ଲିକା
ନିଗୁମ୍ଫନିର୍ଝରକ୍ଷରନ୍ମଧୁଲିକା ମନୋହରଃ
ତନୋତୁ ନୋ ମନୋମୁଦଂ ବିନୋଦିନୀ ମହର୍ନିଶଂ
ପରଶ୍ରିୟଃ ପରଂପଦଂ ତଦଙ୍ଗଜତ୍ଵିଷାଞ୍ଚୟଃ ॥
ପ୍ରଚଣ୍ଡବାଡ଼ବାନଳ ପ୍ରଭାଶୁଭପ୍ରଚାରିଣୀ
ମହାଷ୍ଟସିଦ୍ଧିକାମିନୀଜନା ବହୁତ ଜଳ୍ପନା
ବିମୁକ୍ତବାମଲୋଚନା ବିବାହକାଳିକ ଧ୍ଵନିଃ
ଶିବେତି ମନ୍ତ୍ରଭୂଷଣା ଜଗଜ୍ଜୟାୟ ଜାୟତାଂ ॥
ଇମଂ ହି ନିତ୍ୟ ମେଵ ମୁକ୍ତ ମୁତ୍ତ ମୋତ୍ତମଂ ସ୍ତଵଂ
ପଠନ୍ସ୍ମରନ୍ ବ୍ରୁଵନ୍ନରୋ ଵିଶୁଦ୍ଧି ମେତି ସନ୍ତତମ୍ ।
ହରେ ଗୁରୌ ସୁଭକ୍ତିମାଶୁ ୟାତି ନାନ୍ୟଥା ଗତିଂ
ଵିମୋହନଂ ହି ଦେହିନାଂ ସୁଶଂକରସ୍ୟ ଚିନ୍ତନମ୍ ॥ 14 ॥
ପୂଜାଵସାନ ସମୟେ ଦଶଵକ୍ତ୍ରଗୀତଂ ୟଃ
ଶଂଭୁପୂଜନପରଂ ପଠତି ପ୍ରଦୋଷେ ।
ତସ୍ୟ ସ୍ଥିରାଂ ରଥଗଜେଂଦ୍ର ତୁରଙ୍ଗୟୁକ୍ତାଂ
ଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ସଦୈଵ ସୁମୁଖିଂ ପ୍ରଦଦାତି ଶଂଭୁଃ ॥ 15 ॥
जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम् ॥१॥
उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,
और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,
और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।
जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥
मेरी शिव में गहरी रुचि है,
जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,
जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?
जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,
और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।
धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,
अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,
जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,
जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,
और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।
जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥
मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,
उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,
ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,
जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।
सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
जिनका मुकुट चंद्रमा है,
जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,
जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,
जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।
ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,
जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,
जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,
जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।
करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्... की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,
सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।
नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥
भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है,
जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।
प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,
पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,
जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं
शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड
तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,
जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,
गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।
दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?
कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,
अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥15॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।
इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥
॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्॥
सद्गुरु: रावण शिव का महान भक्त था, और उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक भक्त को महान नहीं होना चाहिये लेकिन वह एक महान भक्त था। वह दक्षिण से इतनी लंबी दूरी तय कर के कैलाश आया- मैं चाहता हूँ कि आप बस कल्पना करें, इतनी लंबी दूरी चल के आना – और वो शिव की प्रशंसा में स्तुति गाने लगा। उसके पास एक ड्रम था, जिसकी ताल पर उसने तुरंत ही 1008 छंदों की रचना कर डाली, जिसे शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना जाता है।
उसके संगीत को सुन कर शिव बहुत ही आनंदित व मोहित हो गये। रावण गाता जा रहा था, और गाने के साथ–साथ उसने दक्षिण की ओर से कैलाश पर चढ़ना शुरू कर दिया। जब रावण लगभग ऊपर तक आ गया, और शिव उसके संगीत में मंत्रमुग्ध थे, तो पार्वती ने देखा कि एक व्यक्ति ऊपर आ रहा था।
अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, "वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है"।
अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”। लेकिन शिव अभी भी संगीत और काव्य की मस्ती में लीन थे। आखिरकार पार्वती उनको संगीत के रोमांच से बाहर लाने में सफल हुईं। और जब रावण शिखर तक पहुंच गया तो शिव ने उसे अपने पैर से धक्का मार कर नीचे गिरा दिया। रावण, कैलाश के दक्षिणी मुaaख से फिसलते हुए नीचे की ओर गिरा। ऐसा कहा जाता है कि उसका ड्रम उसके पीछे घिसट रहा था और जैसे-जैसे रावण नीचे जाता गया, उसका ड्रम पर्वत पर ऊपर से नीचे तक, एक लकीर खींचता हुआ गया।अगर आप कैलाश के दक्षिणी मुख को देखें तो आप बीच में से ऊपर से नीचे की तरफ आता एक निशान देख सकते हैं ।
कैलाश के एक मुख और दूसरे मुख के बीच में अंतर या भेदभाव करना ठीक नहीं है, लेकिन कैलाश का दक्षिण मुख हमें ज्यादा प्रिय है क्योंकि अगस्त्य मुनि कैलाश के दक्षिणी मुख में विलीन हो गये थे। तो ये शायद सिर्फ एक दक्षिण भारतीय पक्षपात है कि हमें कैलाश का दक्षिणी मुख ज्यादा पसंद है, और मुझे लगता है कि ये सबसे ज्यादा सुंदर है। ये सबसे ज्यादा श्वेत भी है क्योंकि वहां बहुत ज्यादा बर्फ है।
कई तरीकों से, इस मुख में सबसे ज्यादा तीव्रता है। लेकिन बहुत ही कम लोग हैं जो कैलाश के दक्षिणी मुख की ओर जा सकते हैं। ये बहुत ही दुर्गम है और वहां पहुंचना कम लोगों के लिये संभव है, क्योंकि इसका मार्ग अन्य मुखों की तुलना में बहुत ज्यादा कठिन है और कुछ ख़ास तरह के लोग ही वहां जा सकते हैं।
